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दोस्त उस गुलाब की भांति होता है जो जिंदगी को महका देता है। दोस्त कभी बोझ नहीं होता, उसके होते बोझ घट जाता है।
राम, बलराम और बड़थ्वाल: राम और बलराम दोनों ने, भोपाल के उसी ऑफिस के तीसरे मित्र को, करीब 630 कि.मी. दूर रायपुर में सेवारत उसके भाई के बाबत टेलीग्राम थमाया। लिखा थाः ‘‘बृजेश कुमार डी.के. अस्पताल रायपुर में गंभीर हालत में भरती। तुरंत पहुंचें।’’ माजरा कुछ भी हो सकता था। महीना खत्म होने को था, यानी हाथ तंग था।
टेलीग्राम पर प्रतिक्रिया जाने बगैर उन्होंने तीसरे से प्रश्न किया, ‘‘तुम्हारे साथ हम दोनों में से कौन चलेगा?’’
जवाबी चेहरे में उभरी शंका का समाधान भी स्वयं पेश कर दिया, ‘‘उसका (यानी पैसे का) इंतजाम हो गया है, राउतराय भाईसाहब से चैक ले लिया है, रास्ते में कैश उठा लेंगे। अब समेटो, ढ़ाई घंटे बाद, साढ़े तीन बजे के.के. एक्सप्रेस से चलना है।’’ तीसरे को भारी राहत मिली।
नवंबर 1984 का वाकिया है यह। उन दिनों भोपाल शहर की सरहद नबी बाग में स्थित उस समूचे ऑफिस की फिजाएं तीनों की अंतरंग दोस्ती के किस्सों से सराबोर रहतीं। पिछले 41 सालों ने उनकी घनिष्ठता को गहराया है और दोस्ती की शास्त्रीय परिभाषा ‘‘दोपहर बाद की, अंत तक बढ़ती रहती छाया की भांति’’ की मिसाल पेश की है। बता दूं, उस तिगड़ी का तीसरा शख्स यही लेखक था।
दोस्त हमारी धड़कन और सरहदें जानता है, उसे अपनी चिंताएं बताई नहीं जातीं। संकट में उससे मांगना नहीं पड़ता, जो उचित है वह बिनमांगे कर डालता है। उसे आप कभी भी बेधड़क खटका सकते हैं। वह बताता है कि तुम्हारी शर्ट का बटन टूटा है या जूते का फीता खुला है। सच्चा दोस्त वह कतई नहीं जो फर्राटेदार बाइक, नई लग्ज़री गाड़ी या स्टाक-शेयर खरीदने के लिए उकसाए, कर्ज दे या दिलवाए। दोस्त वह है जो इन मदों के लिए मदद देते हाथ पकड़ ले, हां शादी, मकान, इलाज जैसी जरूरतों के लिए दिल खोल दे; जिसके घर का रास्ता कभी सुदूर नहीं हो; वह कभी बोझ नहीं होता; जो आपको झकझोर सके कि तफरीह के लिए नहीं, बीमार मां को देखने जाना है। आंखें मूंदे हामी मिलाने वाले साथी हो सकते हैं, दोस्त नहीं। प्लूटार्क ने कहाः मुझे वह दोस्त नहीं चाहिए जो मेरे मुंडी हिलने पर वह भी हिला दे, ऐसा मेरी परछाई बेहतर कर लेती है।
दोस्ती की बुनियाद: दोस्ती की प्रचंड ताकत की बुनियाद ढ़ाई आखर का ‘प्यार’ है जो वह सब करा सकता है जो किसी पावर के बस की नहीं। मित्रता की अपार शक्ति से फायदा लेने के मकसद से सरकारी, पेशेवर, कारोबारी सभी संगठन एक दूसरे का हाथ थामते हैं; सभी राष्ट्र पड़ोसी व अन्य देशों से मैत्री और मैत्रीपूर्ण संबंध बनाने की चेष्टा करते हैं।
यह मानते हुए कि मित्रभाव में दुनिया के विभिन्न पंथों, समुदायों, राष्ट्रों और संस्कृतियों के बीच मतभेद पाट कर शांति कायम करने की सामर्थ्य है, प्रतिवर्ष मैत्री दिवस मनाने का चलन है। मैत्री बढ़ेगी तो आपसी सौहार्द और विश्वास पुख्ता होगा जो आज के हालातों में खासकर जरूरी है। मैत्रीपूर्ण संबंध समस्त मानवजाति के कल्याण की बुनियाद है। पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन के अनुसार दोस्ती ही एकमात्र सीमेंट है जो पूरी दुनिया को एकजुट रख सकता है।
जीने के लिए कंधा चाहिए, इसके बिना गुजारा नहीं। दोस्त चूंकि हमारी रग रग जानता है, मूर्खतापूर्ण व्यवहार सहित हम उससे सब कुछ शेयर कर सकते हैं। अपने दुख-सुख, करुणा, आक्रोश, तकलीफें बतियाने को जिनके पास कोई नहीं वे अभागे हैं। उन्हें अपने भीतर झांकना होगा कि चूक कहां है? जिन्हें शिकायत है कि आजकल सही दोस्त कहां मिलते हैं, उनसे अर्ज है वे स्वयं किसी का अच्छा मित्र बन कर देखें।
सुविदित रूसी कथाकार चेखब के एक बेचारे पात्र का कोई श्रोता नहीं था अतः रोज शाम को अपनी लिखी कहानी वह घोड़े को सुनाता। अपने आप में सिमटे रहने से दिल व मन बोझिल रहते हैं। खासकर शहरों-कस्बों में मंशाएं और सरोकार शेयर नहीं करने की प्रवृत्ति से लोगों को अकेलापन खाए जा रहा है नतीजन डिप्रेशन, उद्विग्नता, सीज़ोफ्रेनिया जैसी मानसिक बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। डब्लूएचओ, एम्स नई दिल्ली व अन्य बरसों से पुष्टि करते आए हैं कि हर चौथा शख्स मानसिक रोग की गिरफ्त में आ चुका है। मानसिक बीमारियों से निजात पाने के लिए अमरीकी पत्रकार रॉबर्ट ब्रॉल्ट ने दवाओं के एवज में कुछ और ही सुझाया हैः ‘‘मनोरोगियों को मनोचिकित्सक की कम, मित्र की ज्यादा जरूरत रहती है।’’
फेसबुकी मित्रों की जमात: मोबाइल फोनों, कंप्यूटरों तथा अन्य इलैक्ट्रोनिक उपकरणों के व्यापक प्रसार का प्रभाव सामाजिक और पारिवारिक रिश्तों पर पड़ रहा है। मित्रता की नींव यानी अंतरंग व्यक्तिगत संवादों और आपसी संबंधों की गरमाहट ठंडी पड़ रही है। युवा पीढ़ी मित्रता की परिभाषा बदल रही है। मित्र का अर्थ वे फेसबुकी मित्र मानते हैं, यानी कोई भी आयाराम गयाराम जो कंप्यूटर पर एक बटन क्लिक करते ही ‘‘मित्र’’ बन जाए। इसीलिए बहुतेरों के मित्र सैकड़ों, कभी कभार हजारों में होते हैं। उसी तर्ज पर, एक बटन से दोस्ती खत्म भी कर दी जाती है। जमीनी सच्चाई यह है कि दोस्त दो-चार से ज्यादा हों तो ईमानदारी से नहीं निभा सकते; 10-15 हो जाएं तो नाम भी गड़बड़ाने लगते हैं। फेसबुकी दोस्ती का एक कड़वा तथ्य है, इस माध्यम से झूठ बोलने की परिपाटी। हर कोई उम्दा छवि के लिए अपनी और अपने से जुड़ी सुनहरी बातें ही, और तथ्यों को बढ़ाचढ़ा कर पेश करता है। कई अध्ययनों ने पुष्टि की है कि नई पीढ़ी अपने इंटरनेट संवादों में 60 से 75 प्रतिशत झूठ लिखते हैं। दोस्तों के हुजूम के बाबत ऑक्सफोर्ड के मानवविज्ञानी रॉबिन डनबार की राय है कि 150 से अधिक दोस्तों से निभाना दुष्कर है, और जो न निभाई जाए वह दोस्ती नहीं। दोस्त तो दो-चार काफी हैं चूंकि एक अकेला गुलाब आपकी जिंदगी को बागबाग कर देगा।
दर असल शुद्ध मुनाफाखोरी से अभिप्रेरित ऑनलाइन फेसबुक, लिंक्ड-इन आदि कंपनियां अपने मंसूबे हासिल करने में पारंगत हैं, वे इन साइटों पर सतही दोस्तों के अंबार का लाभ उठाते है। आमजन को यह फायदा जरूर है कि बिछुड़े सहपाठी, सहकर्मी पकड़ में आ जाते है।
एक दोस्ती ऐसी भी : इंटरनेटी मित्रों से संवादों में उलझने के दुष्परिणामों से समूची दुनिया में सभी सीधे या परोक्ष रूप से प्रभावित हो रहे हैं। मित्रों के चयन में सोच-परख कर सूझबूझ से चलना होगा अन्यथा उनके ऐसे मित्र नहीं बनेंगे जो एक दूसरे को छाया दें और फल भी, बल्कि ऐसे होंगे जिनके बाबत शायर ने लिखा,
उस खेमे में बात मेंरे कत्ल की चल रही थी / मैं पहुंचा तो गले लग कर बोले, / यार! तेरी उम्र बहुत लंबी है।
यह नहीं कि हमें सहयोगी नहीं चाहिएं, ऐसे में हम जी नहीं पाएंगे। किंतु हमें चुनींदा होना पड़ेगा। विनम्रता सभी से, घनिष्ठता कुछ से और पूर्ण विश्वास दो-तीन पर। तभी जिंदगी खुशनुमां गुजरेगी।
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यह आलेख परिवर्तित रूप में दैनिक नेशनल दुनिया में 2 अगस्त 2015, रविवार को फ्रंट पेज पर प्रकाशित हुआ।
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