जिस-जिस की तलाश में हम इधर उधर भटकते रहते हैं उसे अपने भीतर तलाशें।
पर्वतों की सुरम्य चोटियों, किनारों से टकरा कर चूर-चूर होती, छितरती समुद्री झागदार लहरों या सुनहरे रेगिस्तान की मनोहारी छटाओं से अभिभूत पर्यटक लौट कर बताते हैं कि उन पलों से मिलती शांति को किन्हीं भी शब्दों में बखान करना संभव नहीं। लगता है, दिक-काल से परे समस्त फिज़ाओं से उत्पन्न गहरे अंतःकरण तक पसर गई उस शांत, परालौकिक अस्मिता के अलावा सत्य कुछ नहीं है। यह भी कि इस मौन में सभी प्रश्नों और उलझनों के समाधान, और हमारी बेहतरी की कुंजी मौजूद हैं।
सुख-चैन के लिए भटकन: प्रश्न है, क्या अजीबोगरीब फिजाओं की ओर मुखातिब हुए बिना दिव्य शांति को अनुभूत नहीं किया जा सकता? क्या रुटीन परिवेश में रहते परम सुख के आनंद से सदा वंचित रहेंगे?
सुख-चैन हर किसी को चाहिए। किंतु यह सौभाग्य विरलों को मिलता है। अशांत रहने वालों में एक वर्ग उनका है जो मौजूदा वस्तुओं की कद्र नहीं करते। संजोई गई अनंत, असंगत अपेक्षाएं, ख्वाहिशें की आपूर्ति कभी नहीं होती। चिंताओं और संघर्षों में उलझनों से सामंजस्य और शांति भंग होते हैं, बर्नआउट, और मानसिक यंत्रणा में रहना व्यक्ति की नियति बन जाती है।
जिन भावों-धारणाओं को मनमंदिर में एकबारगी प्रतिष्ठित कर देंगे उनकी पड़ताल नहीं करेंगे तो वे क्रमशः गहराती रहेंगी। आंतरिक द्वंद्व को जन्म देती अवांछित, नकारात्मक धारणाओं को बाद में निष्कासित करना दुष्कर होता है। अतः आरंभ में ही सजगता, कड़ाई और निष्ठा से अपनी दशा-दिशा की पुनरीक्षा आवश्यक है।
द्वंद्व जीवन का अंग है, इसे स्वीकार करें: द्वंद्व और अंतर्विरोध जीवनयात्रा का अपरिहार्य अंग है किंतु ये अनिवार्यतः नकारात्मक नहीं होते। विश्व की अनेक शीर्ष कलाकृतियों और साहित्य का निर्माण उन किरदारों ने किया जिन्होंने दीर्घकाल तक पशोपेश, कशमकश, संघर्ष और बहिष्कार झेले। विषमताओं और दुष्कर परिस्थितियों में वे संयत रहे तो उनकी रचनात्मकता निखरी, इसे धार मिली। द्वंद्व की स्थिति में फेर नजरिए का होता है।
एक ही परिस्थिति से कोई इतना टूट जाता है कि कभी नहीं उबर पाता, दूसरा संभले रहता है, हालांकि आहत वह भी होता है। दर असल ट्रैफिक का जाम, बॉस की नुख्ताचीनी, पिता, पत्नी या पति की झल्लाहट, युवा संतान की अवांछित जिद आपको परेशान नहीं करती, आप व्याकुल तब होते हैं जब आपको राहत का मार्ग नहीं सूझता। समस्या से अधिक प्रतीत होती समस्या पर हमारी प्रतिक्रिया – हमारा परसेप्शन है, जो हमें अशांत करती है। कुछ लोग इसलिए सुखी नहीं हैं क्योंकि उनके जीवन में सब कुछ ठीकठाक चल रहा है किंतु इसलिए कि उनके साथ जो भी गुजरता है उसके प्रति सकारात्मक नजरिए के चलते उनकी शांति भंग नहीं होती।
जिन्हें जमीन-जायदाद या पैसा हथियाने की उधेड़बुन में परायों-अपनों से कोर्ट-कचहरी करना रास आ जाए उनके लिए सुख-शांति के द्वार नहीं खुलते। पैत्रिक संपत्ति के बंटवारे में नाइंसाफी का मलाल बहुतेरों का सुख-चैन उड़ा रहा है। लोक ख्याति की प्रतिस्पर्धा या संतति के मोह से उस परम शक्ति की अपेक्षाओं से सुदूर हो जाएंगे जिसके निमित्त आपको इहलोक में भेजा गया है। इसके विपरीत, ईश्वरीय शक्ति से तालमेल में जीना सीख जाएंगे तो प्रकृति की सभी रचनाओं में उस शांति से साक्षात्कार होगा जो हमें निरंतर परालौकिक ज्ञान से प्रदीप्त रखेगी। तब आपमें शांति, सुख-चैन या पुण्य के लिए तीर्थाटनों, धर्मस्थलों या अन्यत्र कूच करने की उत्कंठा नहीं रह जाएगी। यह ज्ञान हो जाएगा कि इन्हें अपने ही भीतर तलाशना, संवारना, और संपुष्ट करते रहना है।
जीवन में उच्च कोटि के आनंद उन्हीं के लिए सुरक्षित हैं जिनका आचरण सहज है, आत्मा प्रफुल्लित और चित्त शांत। भीतर से शांत रहने से सभी कार्य भलीभांति संपन्न होने लगेंगे। परम आनंद की अनुभूति के लिए असाधारण भौगोलिक परिवेश या विशेष परिस्थिति आवश्यक नहीं। आप जहां वास करते हैं, वहीं सब मिल जाएगा, जहां राम वहीं अयोध्या। मन निश्छल हो, विचार स्पष्टता, अपने कर्म से जो उपलब्ध हो उसी में संतुष्टि, तो स्वतः दिव्य सुख बरसेगा। हमें केवल सच्चे साधक की भांति अपने भीतर प्रतिक्षण उमड़ते उन द्वंद्वों और अंतर्विरोधों को शिकस्त देनी है जो निरंतर हमारे विचारों, संवेगों और भावों पर कुठाराघात करने पर तुले हैं।
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तनिक परिवर्तित, संक्षिप्त रूप में प्रकाशित यह आलेख ‘‘बॉस का टारगेट नहीं, मन में शांति न होना है समस्या’’ शीर्षक से नवभारत टाइम्स के स्पीकिंग ट्री कॉलम (संपादकीय पेज) में 16 दिसंबर 2025 मंगलवार को प्रकाशित हुआ।
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