Category: आत्म मंथन

स्वयं को अकेला समझने की भ्रांति न रहे, प्रभु सदा आपके साथ होते हैं

  अप्रिय, विकट या असह्य परिस्थिति में अनेक व्यक्ति स्वयं को नितांत अकेला और बेबस महसूस करते हैं। एकाकीपन की वेदना में कुछेक आवेग में जघन्य कृत्य तक कर डालते हैं हालांकि मामला सामान्य था। समझ का फेर है। जीवन में मात्र दस प्रतिशत वह होता है जिसे हम वास्तव में भोगते हैं, शेष नब्बे […]

आप स्वेच्छा से दुनिया में नहीं आए, जा कैसे सकते हैं?

  अपने अंतरंग मित्र (डा0) गिरधारी नौटियाल बचपन में अपनी एक कविता सुनाते थे, जिसकी पहली पंक्ति है, ‘‘जीवन कभी-कभी जाने क्यों, विषधर बन जाता है?’’ दशकों बाद जैन मुनि तरुण सागर से वैसी ही सुनी, ‘‘ऐसा कोई व्यक्ति न होगा जिसने अपने जीवनकाल में कभी न कभी आत्महत्या का प्रयास न किया हो, या ऐसा […]

जो चाहेंगे वह अवश्य मिलता है, इसलिए भलीभांति विचार कर लें, क्या चाहिए?

बेहतरीन मंजिलों तक पहुंचने के लिए दहकती चाहत आवश्यक है। चाहत के प्रचंड होने पर व्यक्ति की सुषुप्त शक्तियां जागृत होती हैं, ब्रह्मांड की शक्तियां सहयोग देती हैं, और मनोवांछित मिल जाता है। इसीलिए, हमें क्या चाहिए, इस बाबत भलीभांति विचार कर लेना आवश्यक है। लोभ से प्रेरित एक भक्त की अपार साधना से अभिभूत […]

आत्मसम्मान विकृत हो जाए तो अहंकार में बदल जाता है

कुदरत ने हर किसी को अथाह समझदारी और ताकत दी है। किंतु आपके समझदार होने से दूसरा व्यक्ति बेवकूफ नहीं हो जाता। आत्मसम्मान का भाव हमें हौसले देता है, लेकिन दूसरों को हेय समझेंगे तो आप ही भाड़ में चले जाएंगे। पति-पत्नी, पिता-बेटा, भाई-बहन, पड़ोसियों या मित्रों में जरा सी कहासुनी के बाद दोनों पक्षों […]

कम बोलेंगे तो आपकी बात का वजन ज्यादा होगा

कम बोलेंगे तो आपकी बात को ज्यादा तवोज्जू दिया जाएगा। फिर भी बकर–बकर करने वालों की कमी नहीं। जहां एक वाक्य से काम चलता है वहां तीन, चार या पांच बोलने, और खामख्वाह की तकरार से आप अपना भी समय खराब करते हैं, दूसरों का भी।  घर आए मित्र को ताजा लिखी कविता के एक […]

आसक्ति ईश्वर से हो जाए तो जीवन सफल हो जाता है

बस यात्रा बमुश्किल चार घंटे की थी। रास्ते में चायपान के बाद बस दोबारा चलने लगी तो दो यात्री एक ही सीट की दावेदारी में भिड़ गए। एक की दलील थी, सीट शुरू से उसी की थी, इसलिए गंतव्य तक इस पर उसी का अधिकार है। दूसरे की रट थी कि कम दूरी की बसों […]

समस्याओं से जूझने पर नई राह निकल ही आती है

जिंदगी में धूप-छांव के सिद्धांत को मानने वाले फूलों के साथ कांटों की मौजूदगी की शिकायत नहीं करते। यह संभव नहीं कि बिना अड़चन और चुनौतियों के दैनिक कार्य या विशेष कार्य संपन्न होते चले जाएं। जो इन अप्रिय, अप्रत्याशित घटनाओं से जूझने के लिए स्वयं को तैयार नहीं रखेंगे उनके लिए जीवन अभिशाप बन […]

एक पक्ष पूर्वजों के प्रति आभार ज्ञापन का: वार्षिक श्राद्ध

नतमस्तक होना, विनम्र रहना और कृतज्ञता का भाव रखना भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग रहा है। पुरखों, मातापिता सहित उन सभी व्यक्तियों और संस्थाओं के प्रति ऋणी रहने का भाव — जिनका हमारे जन्म, हमारी परवरिश, शिक्षा तथा आजीविका प्रदान करने में योगदान रहा — हमारे जीवन को सार्थक और बेहतर बनाता है। इस दृष्टि […]

काल चक्र पर विचार

काल चक्र में नए-पुराने के मायने नहीं होते, क्या पिछला साल, क्या नव वर्ष। यह तोअतीत-वर्तमान-भविष्य की त्रिपक्षीय किंतु एकल, अनवरत अस्मिता है। काल की परिकल्पना एक चक्र के रूप में की गई है जो क्रमशः आगे की ओर घूमता रहता है, और कभी पूर्व अवस्था में नहीं लौटता। इस चक्र की धुरी वर्तमान है […]

अहंकार

जंगल के दूसरे किनारे जाती मक्खी को उसी दिशा में अग्रसर एक हाथी दिखा, वह उसके कान के ऊपर सवार हो गई। कुछ दूरी तय होने पर बोली, “हाथी भाई क्षमा करना, मेरे कारण तुम्हें थोड़ा कष्ट जरूर होगा किंतु मुझे खासी राहत मिल रही है”। हाथी ने नहीं सुना। थोड़ी देर बाद हाथी को […]

चुनौती

दीर्घावधि तक टिकी या बेकाबू प्रतीत होती कठिनाई, दुविधा या रुकावट चुनौती का रूप ले लेती हैं। सामान्य सोच बिसार देती है कि फूल हैं तो कांटे भी होंगे। प्रतिकूल परिस्थितियां जीवन का अभिन्न अंग हैं, इनका आना-जाना लगा रहेगा और इन्हें स्वीकार करना होगा। अंधकार न हो तो प्रकाश की कद्र कैसे होगी? उसी […]

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