[दिल्लीनामचा – एक] देहली, लुटियन का टीला, और इसकी तासीर

दिल्ली बेशक ऐतिहासिकता समेटे, बहुत तेजी से उभरते एक बड़े देश की राजधानी है किंतु दोटूक कहें तो इस शहर में फक्र के लायक, सत्ता की धुरी होने के सिवाए, ऐसा कुछ नहीं बचा है जिसके चलते इस महानगरी को अन्य शहरों के मुकाबले बेहतर कहा जा सके। दिल्ली की एक समेकित, अलहदा अस्मिता, पहचान या फितरत नहीं है।

आप ‘‘दिल्ली वाले’’ को परिभाषित नहीं कर सकते! उसके व्यवहार या आचरण में कोई स्पष्ट पैटर्न नहीं मिलता। उसकी बातचीत कर्कश, निर्लज्ज, लट्ठमार भी हो सकती है, और दूसरे छोर पर सौम्य, शालीन भी। कहीं बीस रुपए आसानी से छोड़ देगा, तो उसी हालात में अन्यत्र एक रुपए के लिए मारपीट पर उतर आएगा। आप कहें कि इस शहर की खासियत इश्कगाह बन चुके यहां के पार्क और मेट्रो परिसर हैं तो दुहाई है!

‘‘दिल्ली दिल वालों की है’’, यह घिसापिटा जुमला भर है। दिल ऐसा कि मुमकिन है, विदेश से आ कर वापस लौटती अविवाहित बेटी को दरवाजे से ही अलविदा कह दे!

अपना मौसम भी नहीं:  इस शहर का अपना कोई मौसम नहीं है। मसूरी और शिमला के पहाड़ तय करते हैं कि दिल्लीवासी सर्दी की ऐन दोपहर भी ठिठुरते रहेंगे। उधर राजस्थान की मरुस्थली बयारें दिल्लीवासियों को झुलसाने में कसर नहीं छोड़तीं।

अनेक शहरों की और वहां के निवासियों की विशेषताएं हैं। भोपाल में महिलाओं का बोलचाली लहजा खासा प्यारा और सुरमय है; भोजन के बाद तश्तरी में इलायची-सौंफ-मिश्री हो न हो, सुपारी-संरौता, तंबाखू की सूखी पत्तियां, चूना, लौंग पेश किया जाना अनिवार्य है। कोलकाता में, लोकल बस टर्मिलन में दो व्यक्ति भी लाइन में खड़े मिलेंगे; लाल बत्ती पर गाड़ियां एक दूसरे से सटने के बदले करीने से एक के पीछे एक लगेंगी, कितनी भी बड़ी लाइन लग जाए; लंच घाट पर पांच रुपए की झालमूड़ी ले कर सौ का नोट थमाएंगे तो बगैर नुकुरपुकुर किए प्यार से बैलेंस लौटाया जाएगा। कंडक्टर आपका दस पैसा लौटाने के लिए चिल्लड़ की थैली को बार-बार खंगालेगा; किसी को किताब बाएं हाथ से देंगे तो कहेगा, दाएं हाथ से दें। शहर का दस्तूर है, शादी-ब्याह या अन्य सामूहिक आयोजनों में भोजन खिलाया जाएगा तो बाकायदा कुर्सी-मेज पर बैठा कर, कितनी ही खेप लग जाएं, खड़े-खड़े कभी नहीं।

तिरुवनंतपुरम (त्रिवेंद्रम) में भोजन विक्रेता बासी खाना देने की जुर्रत नहीं करेगा; सामने से आती गाड़ियां आपको सड़क पार करते देखती हैं तो पर्याप्त दूरी रखते हुए आपको पहले जाने दिया जाएगा। दिल्ली में कैसे छनती है, सभी जानते हैं।

विभिन्न प्रांतों, समुदायों के जो लोग दिल्ली में सेटल हो गए तो अलग-अलग गुणों के मिश्रण की मानिंद। अधिसंख्य अपनी वही सोच और पुराने तौर-तरीकों और दायरों तक चितरंजन पार्क, सीलमपुर, उत्तम नगर सरीखी कॉलोनियों में सिमट गए। यहां की कोई मुख्यधारा होती तो उसमें रच-पच जाते।

लुटियन के टीले की तासीर:  “मैं दिल्ली वाला हूं, इसलिए जुदा हूं, और दूसरों से बेहतर हूं”। हम भूल जाते हैं, दिल्ली के टीले की तासीर उज्जैन के विक्रमादित्य सरीखी नहीं, लुटियन की है। क्षण भर को समझ आता है कि राजनीति, ब्यूरोक्रेसी या कारोबार के शीर्ष पर बैठों को सत्ता के नशे में स्वयं को श्रेष्ठ समझने की खुशफहमी जल्द हो जाए। नामी पत्रकार प्रभाष जोशी ने कभी देश के सत्तासीनों में अहंकार घर जाने, अपनों से दूरी बनाने, और जनहित को बिसारने की प्रवृत्ति का दोष लुटियन के टीले की तासीर पर मढ़ा था। अफसोस, दिल्ली के आमजन इस रोग से ग्रस्त हैं जो इस शहर के लिए अच्छा संकेत नहीं है।

ईश्वर सद्बुद्धि दें:  कुछ वर्ष पूर्व तक जिनकी गुजर बसर जैसे तैसे चलती थी, एक अदद फ्लैट, गाड़ी, घर के कामकाज के लिए मेड, आदि हासिल कर लेने के बाद महानगर के कुलीन वर्ग का माननीय सदस्य समझने वाले इस बीमारी के अधिक ग्रस्त हैं। अहंकार से फूले, ऐंठे रहेंगे। इनके बाबत यही कहेंगे, ईश्वर उन्हें सद्बुद्धि दें, और उनका भविष्य उतना कष्टकारी न हो जिसके लिए वे स्वयं को तैयार कर रहे हैं!

पुनश्चः  मैं दिल्ली में पढ़ा, बढ़ा हूं; मेरे निर्माण में इस नगरी का खासा अंशदान रहा। दिल्ली ने मुझे बहुत कुछ दिया, मैं इस नगरी का ऋणी हूं। इस आलेख में मेरा आशय यहां की फिजाओं में रच-पच गए कदाचार से है।

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