दैनंदिन जीवन में हम जिन शब्दों का, जितनी सच्चाई और जिस लहजे से प्रयोग करते हैं उनसे हमारा व्यक्तित्व निर्मित होता है और हमारी सोच पता चलती है। अंतर्निहित अलौकिक शक्ति के चलते शब्दों में प्राणदाई और विनाशकारी दोनों क्षमताएं हैं। शब्दों के साधकों को हल्के में लेना आपके हित में नहीं होगा।
मनुष्य का अंतर्मन विचार, आकांक्षाओं और भावनाओं का वास है। यही गुण उसे अन्य जीवों से इतर, बेहतर श्रेणी में रखता है। शब्दों का कार्य विचार और भावों को अभिव्यक्ति देने तक सीमित नहीं है। शब्द, विचार और भाव मूलतः बाह्य जगत की अस्मिताएं हैं। इनका साहचर्य, और उद्गम समस्त लौकिक-अलौकिक जगत को संचालित करती सार्वभौम चेतना या ब्रह्मांडीय शक्ति है।
शब्द क्या हैं: शब्द निर्जीव अस्मिता नहीं हैं बल्कि अथाह क्षमता से परिपूर्ण, निरंतर स्पंदन की स्थिति में रहने वाले जीवंत ऊर्जापिंड हैं। यह जानते हुए सुधीजन में शब्दों के प्रति श्रद्धाभाव रहता है, वह इनका अपव्यय नहीं करेगा बल्कि सुविचार के उपरांत इनका उपयोग करेगा। शब्दप्रेमी और शब्दों के बीच अंतरंग संबंध स्थापित हो जाता है। जरूरत पड़ने पर शब्द किरदार के समक्ष उपस्थित हो जाते हैं। शब्द हमारे व्यक्तित्व की गरिमा को समृद्ध करते हैं। शब्द जीवनदायिनी बन कर अशक्त का उद्धार करते हैं वहीं अस्त्र का रूप ले कर विनाशकारी भी हो सकते हैं।
शब्द प्रेमी ईश्वर का प्रतिनिधि होता है: शब्दों का समादर ब्रह्मांडीय शक्ति में आस्था का परिचायक है। जब व्यक्ति स्वयं को उच्चतर शक्तियों का अंशमात्र मान लेता है, तब उसमें उद्विग्नता, अहंकार, लोभ, ईर्ष्या, वैमनस्य, स्वार्थपरकता जैसे विकारों का विलोप होने लगता है। शांत मन और स्थिर चित्त की स्थिति को प्राप्त ऐसा व्यक्ति ईश्वर का प्रतिनिधि होता है, उसके मन, आचरण और कार्य में ईश्वर की झलक मिलेगी। वह वैसा बोलता, लिखता और करता है जैसा ईश्वर चाहते हैं। अपने भीतर निहित दिव्यदृष्टि के कारण उसे कालांतर में घटने वाली परिस्थितियों का आभास हो जाएगा। उसके मुख में सरस्वती विराजमान रहती है और उसके शब्द निष्फल नहीं जाते। ऐसे व्यक्तियों के सानिध्य से जीवन सार्थक हो जाता है।
शब्द प्रेम की शक्ति: शब्द प्रेमी लोकहित भाव से अभिप्रेरित होगा, तथा उच्च जीवनमूल्यों की प्रतिष्ठा के लिए सतत प्रयत्नशील रहेगा। उसमें सन्मार्ग के पथिकों को पहचानने की अद्भुद् क्षमता होती है। ईश्वरीय संबल प्राप्त होने के कारण उसके गिर्द सकारात्मक अलौकिक वातावरण निर्मित हो जाता है। जिस प्रकार पित्रों और नेक वयोवृद्धों की शुभकामनाएं आगामी पीढ़ियों की उन्नति सुकर बनाती हैं और उनको दी गई पीड़ा विनाश ढ़ाती हैं, उसी भांति आहत होने पर सदाचारियों और संतों का आक्रोश या अभिशाप व्यर्थ नहीं जाता। स्वामी करपात्रीजी महाराज तथा इस कोटि के सिद्ध संतों के अभिशाप के साकार होने के उदाहरणों से हम परिचित हैं।
आपको आशीर्वाद किन से चाहिए? उनसे जो आध्यात्मिक रूप से विपन्न हैं, धन-पद-लोकप्रियता ही जिनका परम लक्ष्य है, उनसे? या उन दूरदृष्टाओं से जो उच्च शक्तियों से जुड़े हैं। इसका भलीभांति विचार कर लें।
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इस आलेख का संक्षिप्त रूप दैनिक जागरण के संपादकीय पेज पर आशीर्वाद की शक्ति शीर्षक से 11 अगस्त 2026, मंगलवार को प्रकाशित हुआ।
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