पैदल न चलने या कम चलने का मतलब है घुटनों तथा हड्डियों की तमाम बीमारियों को न्यौता। पैदल चलने वालों के लिए पग-पग पर दिक्कतें हैं। सुप्रीम कोर्ट कहता है पैदल यात्रियों को सुविधापूर्वक फुटपाथ पर चलने का हक है किंतु फुटपाथी विक्रेताओं को भी आजीविका के अधिकार से वंचित नहीं करना!
फालतू के भारी-भरकम फुटपाथी पुलों की दास्तान अलग है।
बड़े-छोटे, सभी शहरों में यातायात अत्यधिक बढ़ने से पैदल सड़क पार करना आफत बन चुकी है, विशेषकर बच्चों, बुजुर्गों और अशक्तों के लिए। वाहनों की संख्या में तेज बढ़त का सिलसिला जारी है। वाहन प्रेमी दिल्लीवासी देखादेखी या स्टैटस बनाने के चक्कर में बगैर जरूरत भी वाहन खरीद लेते हैं। दिल्ली शहर को सभी प्रकार के पंजीकृत वाहनों में टॉप पर (1.2 करोड़) रहने का गौरव प्राप्त है। नतीजन दिल्ली में कई जगह तो ट्रैफिक थमने के लिए 10-20 मिनट इंतजार के बाद भी पार जाने में जोखिम रहता है। अन्य नगरों-महानगरों में भी यही स्थिति बन रही है।
पैदल चलने की विलुप्त होती परिपाटी: दुर्भाग्यपूर्ण है कि पैदल चलने की परिपाटी खत्म हो रही है। फुरसत में हों, स्वस्थ हों, तो भी 100-150 मीटर के लिए रिक्शा चाहिए, नाक छोटी होने का भय जो रहता है। शरीर को हरकत में न रखने के दुष्परिणाम सामने हैं। संप्रति देश के 15 करोड़ लोग घुटने की बीमारियों से ग्रस्त हैं और डेढ़ लाख से अधिक घुटने की सर्जरी प्रतिवर्ष हो रही हैं। शरीर के अंगों-प्रत्यंगों को चलाते न रहने से हड्डियों की तथा अनेक संबद्ध बीमारियां लगने का ज्ञान बहुतेरों को है, यह भी कि कम हरकत के कारण घुटना बदलने (नी रिप्लेसमेंट) और कंधा जाम होने (फ्रोजन शाउल्डर) के मामले आए दिन बढ़ रहे हैं।
पैदल चलने वालों पर सितम: करेला नीम चढ़ा। जो पैदल चलना चाहें उनके लिए दिल्ली की फिजाएं न पहले अनुकूल थीं, न आज हैं। अधिसंख्य मुख्य सड़कों पर रेलिंग लगी हैं, 200-300 मीटर तक पैदल पार नहीं जा सकते। भारी आवाजाही वाले स्थलों, जैसे बस टर्मिनल, रेलवे स्टेशनों आदि में लिफ्ट या ऐसकेलेटर सीमित हैं। कई जगह एस्केलेटर (स्वचालित सीढ़ियां) लगाए जरूर, गए किंतु कुछ सप्ताहों की प्रोबेशन अवधि पूर्ण होते ही वे ठप्प हो गए। अधिसंख्य एस्केलेटरों के समूचे स्ट्रक्चर ही अपने स्थान से गायब होते चले गए। अब वहां पार जाने के लिए घुमावदार सीढ़ियां ही हैं। किन्होंने उन एस्केलेटरों की योजना बनाई, किन्होंने बगैर मेनटेनेंस के अनुबंध के मंजूरी दी, इन सबकी जांच होनी चाहिए है।
यही आलम कंक्रीट की सीढ़ियों का रहा। इनमें से एक भारी-भरकम पुल 1970-1980 के दशक में बनाया गया, यह आईएसआई/यूजीसी साइड से लिंक हाउस को जोड़ता था। चूंकि पार जाने के लिए लालबत्ती से टापने की तुलना में कई गुना ज्यादा चलना पड़ता था, रोजाना के दौड़ादौड़ी कामकाजी तो इसका प्रयोग करने से रहे। बड़ी परियोजना के तहत बनते इन अव्यवहारिक पुलों के निर्माण से दो वर्गों को लाभ होता; पहला प्लानिंग और मंजूरी देने वाले तथा ठेकेदार; दूसरा वर्ग भिखारियों-नशैड़ियों का, जिन्हें यहां आमदनी और पनाह मिलती। छिनताई, छेड़छाड़ जैसी संभावित वारदातों से बचने के लिए सीधे, सभ्य लोग इनका प्रयोग कम ही करते थे। दिल्ली के अंतर्राज्यीय बस अड्डों, रेलवे स्टेशनों, तथा अन्य भीड़भरे स्थलों में पदयात्रियों के चढ़ने-उतरने के लिए एस्केलेटरों या लिफ्टों की सीमित संख्या सामान ढ़ोते यात्रियों की कोफ्त का सबब बन रही हैं।
पुल बनें तो ऐसे: सत्तर और अस्सी के दशक में दरिया गंज के गिर्द आने-जाने वाले याद करें। दरिया गंज की मुख्य सड़क के उत्तरी किनारे पर कबाड़ी बाजार की तरफ लाल बत्ती से कमोबेश सटा, सड़क पार जाने के लिए कम ऊंचाई का लकड़ी का पुल होता था। भरपूर इस्तेमाल होने वाले इस पुल पर आते-जाते मधुर ढ़म-ढ़म मेरी तरह दूसरों को भी लुत्फ देती रही होगी।
बहुत मोटे बजट से बने पदयात्री पुल बहुतेरे हैं, यहां दो की बात करता हूं। पहला पटपड़गंज में हसनपुर डिपो के ठीक सामने है। इस पुल से पार जाने में बत्ती के रास्ते की तुलना में पांच गुना पहले घूम-घूम ऊपर, फिर उतना ही नीचे आना होगा। दूसरा पुल हौज़ खास बस स्टॉप पर। प्रत्येक पुल पर सारे दिन दोनों तरफ आने-जाने वालों की कुल संख्या बमुश्किल 15-20 होगी।
यह क्यों संभव नहीं कि भविष्य में कभी इस्तेमाल न होने वाले पैदल पुल आगे बनवाने – और चंद महीनों में डिसमेंटल करने वालों और उनके सहयोगियों को पहचान कर, उन्हीं की भाषा में पेश आया जाए।
कोलकता के पुलों की तर्ज पर पैदल यात्रियों के लिए सुगम, छोटे आकार के किफायती पुल बनेंगे तो सभी को फायदा मिलेगा।
