नेकी और भक्तिभाव से अभिप्रेरित शख्सियत से ऐसा बहुत कुछ सीख सकते हैं जो हमें सुराह पर रखेगा।
उनत्तीस जून 29 जून 2025, रविवार अर्धरात्रि को हमारी चाचीजी श्रीमती हीमादेवी बड़थ्वाल, करीब 85 वर्ष की आयु में, दुनिया से चल बसीं। इन दिनों वे दिल्ली एनसीआर में निवासरत अपने छोटे (सेवानिवृत्त) पुत्र के साथ थीं।
मेरा चाचीजी से करीब 14-15 वर्ष की आयु (यानी वर्ष 1968 के आसपास) से, दशकों तक विशेष लगाव रहा।
असाधारण व्यक्तित्व: चाचीजी साधारण महिला नहीं थीं। अथाह सहिष्णुता, त्याग, कर्मठता, भक्ति, प्रेम-स्नेह, और परसेवा भाव से सरोबार। सदा प्रसन्नचित्त रहतीं। जिनका भी उनसे व्यवहार रहा उनकी स्मृति संजोए रखता। इसके पीछे उनका कठोर जीवन और अनुशासन भी था। मात्र 24 वर्ष की अल्पायु में उनके पति यानी हमारे चाचाजी श्रीराम दयाल नहीं रहे; वे मेरे पिताजी के एकमात्र भाई थे। चाचीजी का शुरुआती समय, करीब आधा जीवन गांव में बिता। चाचाजी गावं के नजदीक ही, सहकारिता कार्यालय में सुपरवाइज़र जो थे। उनके कार्यकाल में यह पूर्णतः गैसरकारी विभाग होने से कर्मचारियों को पेंशन तथा अन्य कोई लाभ प्राप्त न थे। मिलनसार और सहयोगी स्वभाव के चलते उन्हें सभी से भरपूर समादर मिला।
भक्ति क्या होती है, कोई उनसे सीखे। उनके नेतृत्व और सानिध्य में अनेक श्रद्धालु अमृतरस का आस्वादन करते तथा तीर्थाटन पर जाते।
तब उनके दोनों बेटे गांव में छोटी कक्षाओं में पढ़ते थे। उनमें से पहले बड़ा (स्वयंबर), कुछ वर्ष हमारे साथ दिल्ली रहा-पढ़ा; उसके उपरांत छोटा (विश्वंभर) जो पढ़-लिख कर दिल्ली ही रच-पच गया।
हम पांच भाई-बहन थे; गांव के प्रति मेरा आकर्षण आरंभ से रहा है। गर्मियों की स्कूली छुट्टियों में हम प्रायः सपरिवार गांव जाते। वापसी भोर, सूर्योदय से पहले होती। कई बार मैं चचेरे भाई के साथ तो कभी कभार अकेले ही, छुट्टियों में गांव चला आता, चाचीजी के पास, उन्हीं के संरक्षण में। दिल्ली वापसी का एक वाकिया सदा हृदय में अंकित रहेगा। रास्ते के लिए अनिवार्यतः भरपूर मात्रा में, करीने से ‘माल’ के पत्तों में पैक की गई स्वादिष्ट पूरी-सब्जी मिलती। भोर से कितना पहले जग कर वे इतना कार्य कर डालतीं, आश्यर्च होता।
दूसरों की इच्छा का सम्मान: गांव में उन दिनों सीमित सब्जियों के सेवन का प्रचलन थाः आलू, प्याज, सीताफल, पपीता। किंतु चाचीजी रोज शाम को पूछतीं, आज क्या सब्जी बनानी है? मैं कभी आलू, कभी प्याज, कभी आलू-प्याज या प्याज-आलू (यानी आलू या प्याज ज्यादा, दूसरी आइटम कम) की फरमाइश करता। कभी खाने के बाद मीठा भी बन जाता। भारी स्नेहवश वे मेरी इच्छाओं-अनिच्छाओं का पूरा खयाल रखतीं।
गांव रहते एक किस्सा सदा याद रहेगा। मैं तब 15 वर्ष का था, गांव में एक चाचाजी, श्री वाणी चाचा की बारात नजदीक ही, 12 कि.मी. दूर (सिलसू) जाना था, पैदल, उन दिनों वैसा ही चलन था, अन्य विकल्प न था। गढ़वाल की बारात में शामिल होने का यह मेरा पहला संयोग बन रहा था, इसका आनंद लेने की इच्छा थी ही। मेरे बहुत धीमे-धीमे खाने की आदत चाचीजी बखूबी जानती थीं। उन्होंने बारात में जा रहे तीन युवाओं को मुझे ठीक से खिलाने और सुलाने की जिम्मेदारी सौंपी। यह दूसरी बात ठहरी कि उनमें से किसी ने मेरा खयाल न रखा। सभी खा कर उठ कर हाथ धोने की लाइन में थे तो मैं एक हाथ में उठाए हलुए के डले को मुंह में ठूंसता रहा।
दिवंगतों का आशीर्वाद: माता-पिता, परिजनों व अन्य नेक व्यक्तियों के हित में जितना-जितना हमने चाहा और किया उसी अनुपात में हम दिवंगतों के ही नहीं, जिंदों के आशीर्वाद के लाभार्थी होते हैं, ऐसा मेरा निजी अनुभव है, और सुविचारित मान्यता भी।
चाचीजी के अंतिम दर्शन नहीं कर पाया। जिस सुबह उनके दिवंगत होने की सूचना मिली, मैं उस दिन बेटी (सिलोगी) के घर बंबई था, उसी दोपहर अंतिम संस्कार का आयोजन था।
चाचीजी के अगाध स्नेह के अनेक उदाहरण अविस्मरणीय रहेंगे।
ईश्वर पुण्यात्मा को सद्गति प्रदान करेंगे।
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