कौन कहता है, प्रार्थना सुनी नहीं जाती?

प्रार्थना 100 प्रतिशत मनोयोग से संपन्न की जाए तो फल अवश्य मिलेगा

ईश्वरीय तथा उच्चतर, परालौकिक शक्तियों का अस्तित्व कमोबेश सभी स्वीकार करते हैं। तथापि एक वर्ग इन शक्तियों पर प्रश्न उठाने वालों का भी है। दोनों कोटि के व्यक्ति कठिन, पीड़ादाई या असमंजस के पलों में प्रार्थना का सहारा अवश्य लेते हैं, और प्रार्थना से मनोवांछित फल न मिलने पर कुछ व्यक्ति ईश्वर या भाग्य को कोसने से नहीं अघाते; यह नहीं आंकते कि ईश्वर से उनका संबध कितना प्रगाढ़, सुदृढ़ और निष्ठापूर्ण है।

दुनिया की बहुमूल्य वस्तुएं अनायास नहीं मिलतीं। जिस से आपका हुक्का-पानी नहीं, आपके चाहने या मांगने भर से वह आप पर मेहरबान कैसे हो जाएगा? पहले सुनिश्चित करना होगा, क्या समुचित भूमि तैयार कर ली गई है!

पहले देना होगा, फिर मिलेगा : प्रकृति का विधान है, जिस अनुपात में देंगे उसी अनुरूप प्रतिफल मिलेगा। अहम यह है, आप सुविचारित मन से निष्ठापूर्वक प्रार्थना करते हैं या तब जब आपको समस्या में घिर जाने पर राहत के लिए कोई अन्य मार्ग नहीं सूझा?

ईश्वरीय सत्ता में अटल आस्था : स्वयं को ईश्वरीय सत्ता की एक अभिन्न इकाई मानने वाला जीवन के उतार-चढ़ावों से विचलित नहीं होता। वह आश्वस्त रहता है कि ईश्वर उसके हैं और वह ईश्वर का है, ईश्वर उसके लिए जो करेंगे वह उसके दूरगामी हित में होगा। उसकी प्रार्थना न तो भय या अनिष्ट की आशंका से अभिप्रेरित होती है, न ही लाभ के गणित से। उसके अंतर्मन में केवल निरंतर ईश्वरीय छाया की कामना रहती है।

प्रत्येक जीव में अंतर्निहित दिव्य तत्व के कारण उसका परमशक्ति से अविरल तादात्म्य है, यह जान लेंगे और अनुभूत करेंगे तो ईश्वर से लौकिक सुख-संपत्ति की अपेक्षा न रहेगी, कुछ मांगने के लिए याचना नहीं करनी पड़ेगी।

प्रार्थना क्या है? : ईश्वर ने मनुष्य को अर्थपूर्ण जीवन बिताने की अथाह सामर्थ्य प्रदान की है। उनके प्रति कृतज्ञता की अभिव्यक्ति के स्थान पर कभी पूर्ण न होने वाली सांसारिक इच्छाओं की आपूर्ति की याचना प्रार्थना न हुई, न ही वह फलीभूत होगी। प्रार्थना एकल या सामूहिक स्तर पर शब्दों-ध्वनियों के माध्यम से ध्यान केंद्रित करने का नाम भी नहीं है। यह निस्स्वार्थ भाव से परमात्मा से तादात्म्य को पुनर्प्रतिष्ठित करने का एक साधन है।

प्रार्थना का लक्ष्य ईश्वरीय कृपादृष्टि अपने पक्ष में करना नहीं बल्कि उपासक की मनोवृत्ति को इस प्रकार ढ़ालना है कि उसे अपनी भूमिका का सही बोध रहे। इसका कार्य आपके वाहन रूपी जीवन में उचित विधि से गंतव्य तक पहुंचाने वाले स्टीयरिंग व्हील जैसा है, इसे वैकल्पिक स्टेपनी समझने वाले बेचारे हैं, मूर्ख हैं, प्रभु उनकी नहीं सुनेंगे।

99 प्रतिशत आस्था से भी काम नहीं चलेगा, संपूर्ण चाहिए : सूखा, भीषण वर्षा या आपदा के क्षणों में राहत के लिए दुनियाभर के धार्मिक परिसरों में या अन्यत्र प्रार्थनाएं-सभाएं आयोजित की जाती हैं। तो भी, हजारों-लाखों की भीड़ में सच्चे मन से फरियाद कर रहे एकाध होते हैं। प्रभु उनकी अवश्य सुनते हैं, हालांकि दुआएं सभी पर बरस जाती हैं। प्रार्थना में महत्व भाव का है, शब्दों का नहीं। इसमें संपूर्ण विनम्रता, समर्पण और आस्था चाहिएं, 99 प्रतिशत से भी कार्य नहीं सधता।

प्रार्थना की अद्भुद् सामर्थ्य और सच्ची प्रार्थना के सुफल को सभी पंथों में मान्यता है। निजी स्वार्थ की इच्छा उठी, कुछ अन्य न सूझा तो प्रार्थना कर ली, ऐसे में सुफल नहीं मिलेगा। ईश्वरीय व्यवस्था में विश्वास रखें, आपकी प्रार्थना अवश्य सुनी जाएगी।

.. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. .. ..

आलेख का संक्षिप्त प्रारूप ‘‘प्रार्थना का फल’’ शीर्षक से 19 जुलाई 2025, शनिवार को दैनिक जागरण ऊर्जा कॉलम में प्रकाशित।

…. …. …. …. …. …. …. …. …. …. …. …. …. …. …. …. …. …. …. …. …. …. …. …. ….

3 thoughts on “कौन कहता है, प्रार्थना सुनी नहीं जाती?

  1. प्रार्थना में एक अद्भुत सकारात्मक ऊर्जा छुपी होती है, जो जीवन की दशा और दिशा को बदलने की अपार क्षमता रखती है।

  2. क्या आप हमेशा ध्यान आकर्षित करने में अच्छे हैं, या आपने इसे सिर्फ मेरे लिए बनाया है? इस वेबसाइट पर मुझे लिखें — rb.gy/ydlgvk?Ler — मेरा उपयोगकर्ता नाम वही है, मैं इंतजार करूंगा ।

    1. धन्यवाद! आपकी टिप्पणी से स्पष्ट है कि हमारे विचारों, और धारणाओं में काफी समानता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back To Top