शानदार मुकामों तक पहुंचने वाले तंगहाली या सुविधाओं का रोना नहीं पीटते क्योंकि उनके हौसले क्षीण नहीं पड़ते।
दक्षिण भारत में आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक बैठक का किस्सा है। मुख्य वक्ता धोती पहने, नंगे पांव मंच पर पधारे तो अधिकांश प्रतिभागी विस्मय से चौंक गए। किंतु उन्हें सुन लेने के बाद वही प्रतिभागी उनकी विद्वतापूर्ण प्रस्तुति, तथा विषय पर व्यापक और गहरी पकड़ से दंग रह गए। वक्ता की सहज, अनौपचारिक सादगी के चलते प्रतिभागियों नेे उन्हें पहले साधारण आंक लिया था।
किसी भी क्षेत्र के शिखर पर पहुंचने वाले व्यक्तियों में अधिसंख्य वही रहे जिनकी पारिवारिक, आर्थिक या सामाजिक पृष्ठभूमि भले ही साधारण या निम्न रही, किंतु उनके हौसले गजब के थे। हां, उनका जीवन आडंबर और दिखावे से कोसों दूर, सरलता, विनम्रता, और करुणा से सराबोर था। जरूरी नहीं कि वे पैदाइशी अमीर या नामी घरानों से रहे हों। उन्होंने जो भी पाया अपनी मौलिक सोच, दूरदर्शिता, कड़े श्रम, अथाह धैर्य और साधना के बूते। मौजपरस्ती तो दूर, उन्हें रहन-सहन, पढ़ाई, मनोरंजन, खेलकूद आदि की बुनियादी सुविधाएं भी बमुश्किल नसीब हुईं। इसके विपरीत, अनायास ही या विरासत में छप्पड़फाड़ मिल जाना बहुतेरों के विनाश का कारण बन गई।
जिसके दिलोदिमाग में छा जाए कि फलां मंजिल पर कैसे भी पहुंचना है, वह परवाह नहीं करता कि दुनिया उसके रंग, रूप, नक्श, पहनावे, रहन-सहन, बाह्य व्यक्तित्व आदि के बाबत क्या सोचती और बोलती फिरती है। उसे फर्क नहीं पड़ता कि वह कहां रहता है, झोपड़पट्टी में या आलीशान बंगले में।
हौसलों का तानाबाना ईश्वरीय शक्ति में आस्था, प्रबल आत्मविश्वास और सुदीर्घकाल से कुछ नया प्रस्तुत करने की असाधारण उत्कंठा से है। यही गुण व्यक्ति को उन सभी से जुदा कर देते हैं जो दुनियादारी के उसूलों, नियमों, विनियमों से चिपटे-लिपटे रहते हैं।
प्रचुर धन-संपदा हाथ में लग जाने से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण उसे संभाले रखना, और सुविचार से उसका उपभोग करना है।
देखा यह गया है कि अथाह पावर या धन व्यक्ति की सोच को डांवाडोल कर उसे अहंकारी, अय्याश, फिजूलखर्च बना सकती है। उसके दिमाग में खुशफहमी घर जाती है कि धन-संपत्ति या पावर उसे बड़ा नहीं बनाती, वह है ही बड़ा, और उसकी बुद्धि भी बहुत बड़ी हो गई है। उसके पांव धरातल पर नहीं टिकते। उसे एकबारगी के साथी-परिजन हेय लगते हैं, उनसे उसका व्यवहार आडंबरी हो जाता है। मानवीय संवेदनाएं और भले-बुरे की पहचान क्षीण हो जाती है और वह अपनों की सद्भावनाओं से वंचित हो जाता है। यह दुर्गत कारपोरेट दायरों में प्रवेश करती है तो वहां पतन का सिलसिला शुरू हो जाता है। यही कारण है, कुछ दशक पूर्व तक के छाए हूए कंज्यूमर ब्रांड, धार्मिक या अन्य ब्रांडों का नामोनिशान तक मिट चुका है। उनका स्थान नए किरदारों ने ले लिया है। एकबारगी के रजवाड़ों की संतानें मंदिर-मस्जिदों के परिसर में कटोरा थामे भिखमंगों की पंक्ति में मिल जाएंगी। स्वयं को और अपनी अस्मिता को भूल चुके ऊंची नाक वाले आज के बहुतेरे नव-धनाढ्यों की यही गत है।
हौसलों के तार परालौकिक शक्ति से जुड़े होते हैं। यह जुड़ाव किरदार में ऐसी अदम्य ऊर्जा का संचार करता है जिसे तार्किक विवेचना से नहीं समझ सकते, और वह अपनी मंजिल पा लेता है। दुविधा, संकट और बाधाओं के क्षणों में प्रभु का सानिध्य रक्षा कवच बन कर उसे उबार देता है। जिस हृदय में हौसले हैं वहां निष्ठा, उदारता, विनम्रता, और करुणा का भी वास होता है।
लंबी फेहरिस्त है नाना विधाओं के सफल महापुरुषों की जिनका रहन-सहन जमीन और जमीर से जुड़ा रहा। गुलजार की एक लाइन है, ‘‘अक्सर मिट्टी पर बैठ जाता हूं, अपनी औकात मुझे अच्छी लगती है।’’ मिट्टी से कृतज्ञता की अभिव्यक्ति भी है। शीर्ष नेतृत्व के खरे कारोबारी, नेता, वैज्ञानिक, अन्य पेशेवर प्रतिदिन कार्यस्थल की चौखट पर भूमि के समादर में माथा टेकते हैं।
स्व-अर्जित, उससे भी अधिक विरासती साधनाओं-सुविधाओं पर इतराना ओछापन है। बड़प्पन तब है जब साधारण अतीत और बड़ी कामयाबियों के बावजूद आप जमीन से जुड़े रहें, ध्यान सेवाभाव में रहे, अपनी छवि चमकाने-दमकाने में नहीं।
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इस आलेख का असंशोधित, तनिक संक्षिप्त प्रारूप 20 मार्च 2026, शुक्रवार के नवभारत टाइम्स के स्पीकिंग ट्री कॉलम में प्रकाशित हुआ।
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