क्या यह सत्य है कि प्रकाश जीवनदाई है? हम किसी गफलत में तो समूची जिंदगी नहीं गुजार देते?
समूची दुनिया की संरचना द्विपक्षीय हैः फरिश्ता/हैवान, सुख/दुख, दिन/रात, जय/पराजय, अग्नि/जल, लाभ/हानि, नरम/सख्त, आशा/नैराश्य, जीवन/मृत्यु। इसी भांति प्रकाश और अंधकार हैं। ‘प्रकाश’ का साहचर्य ज्ञान, प्रेम, जागरूकता, सकारात्मकता, समृद्धि, उदारता, संपन्नता, पारदर्शिता और सद्बुद्धि से, तो दूसरी कोटि में अंधकार का साहचर्य अनभिज्ञता, घृणा, अहंकार, ईर्ष्या, विपन्नता और संकीर्ण सोच से माना जाता है।
सेंट फ्रांसिस ने कहा, अंधकार कितना भी घनघोर हो, एक छोटे से दीप को नहीं बुझा सकता। उसी प्रकार एक व्यक्ति संपूर्ण विश्व को राह दिखाने वाला प्रकाशपुंज बन सकता है। वैदिक उद्बोधन है, ‘‘तमसो मा ज्योतिर्गमय, असतो मा सद्गमय’’ यानी हे प्रभु, हमें अंधकार से प्रकाश की ओर, असत्य से सत्य की ओर प्रशस्त करो! प्रकाश सूर्य, दिया, मोमबŸाी या किसी भी स्रोत से आए, शुभ होता है, इसमें भविष्य को संवारने की सामर्थ्य है।
सभी पंथों में आराध्य: प्रकाश की अपार शक्ति के कारण इसके स्रोत सभी पंथों में आराध्य है। अग्नि तत्व की स्तुति में दीप प्रज्वलन से परालौकिक अनिष्टों-बाधाओं का निराकरण माना जाता है। दीप प्रज्वलन की प्रथा धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं। अहम साहित्यिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक, औद्योगिक, शासकीय, राजनैतिक या अन्य समारोहों, तथा समस्त निर्माण कार्यों का श्रीगणेश दीप प्रज्वलन बगैर संपन्न नहीं माना जाता। हिंदुओं में दीपावली, इसके कुछ दिन बाद सिखों के प्रकाशपर्व में संदेश है कि भीतरी प्रकाश को क्षीण नहीं होने देना है। इस्लाम में जन्नत और धरती में विद्यमान प्रकाश को खुदा ही माना जाता है। ईसाचरित सदा लैंप के प्रकाश में पढ़ा जाता है और नवनिर्मित गिरिजाघर में पहले पूजास्थल में मशाल और प्रार्थनास्थल के गिर्द तेल के दिए जलाए जाते हैं। बुद्ध के उद्बोधन, ‘‘अप्प दीपो भव’’ में भाव है कि आपको कोई गुरु, तीर्थ जागरूक नहीं कर सकता;प्रबुद्ध रहने के लिए बाहरी स्रोत पर निर्भर नहीं रहना, अपना दीपक स्वयं बनना है।
अंदर से चमकने वाले प्रकाश को कोई शक्ति परास्त नहीं कर सकती। इसीलिए सुधीजनों ने कहा, स्वयं को संवारने के लिए अंधकार को न कोसें, स्वयं प्रकाशवान हो जाएं।
अंधकार के बारे में एक इतर धारणा यह है कि अंधकार नाम की कोई चीज नहीं है, यह केवल अज्ञानता और भय से उत्पन्न अवधारणा है। जहां प्रकाश नहीं, उसमें जीवित रहना जीवित न रहने जैसा है। जहां प्रकाश है, जीवंतता है, वहां भय कैसा?
प्रकाश – एक अबूझ अस्मिता: प्रकाश के स्वरूप के बारे में विज्ञानियों की सटीक, स्पष्ट राय नहीं है। जैसे, इसमें भौतिक वस्तुओं की भांति गतिशीलता है और यह गुरुत्वाकर्षण शक्ति से प्रभावित होती है हालांकि इसमें संहति/वजन है भी तो नगण्य है। दूसरा, यह भी कि इसे सृजित नहीं किया जा सकता! समझाने के लिए, प्रकाश की उत्पति अरबों-खरबों वर्ष पहले उन तारों से बताई जाती हैं। इहलोक में जो प्रकाश हमें उपलब्ध है उसे अपना अस्तित्व कायम रखने के लिए कोई स्रोत चाहिए।
अंधकार’ शाश्वत है: ‘प्रकाश’ के विपरीत, ‘अंधकार’ शाश्वत है, अविनाशी है, और अपनी जीवन यात्रा के बाद हम सभी को उसी के गर्त में समा जाना है। इसी दृष्टि से उपनिषदों में जगत को मिथ्या और केवल ब्रह्म को सत्य कहा गया। प्रश्न है, यह भाव यदि जनमानस में पैठ जाएगा तो दुनिया के कामकाज ठप्प हो जाएगा और अनर्थ हो जाएगा। मायावी संसार की रचना इसीलिए की गई कि हर कोई कहीं न कहीं उलझा रहे, प्रकाश के प्रति जनमानस का आकर्षण रहे, जीवन से विरक्ति न हो जाए।
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आलेख का संक्षिप्त प्रारूप 19 अक्टूबर 2025, रविवार (दीपावली पूर्व संध्या) को दैनिक जागरण के संपादकीय पेज (ऊर्जा कॉलम) में ‘‘प्रकाश’’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ।
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उत्कृष्ट प्रस्तुति। लेखक ने अंधकार और प्रकाश की नए तरीके से सटीक विवेचना की है, जो विचारणीय है।
बहुत उम्दा लेख, हरीश जी !