हिंदू कैलेंडर (पंचांग) का आधार अंतरिक्ष में चंद्रमा और सूर्य की गति है। एकादश का शाब्दिक अर्थ है ग्यारह (1+10) एकादशी प्रति माह दो बार पड़ती है; सभी एकादशियों में सर्वाधिक महत्व कार्तिक के शुक्ल पक्ष की एकादशी का है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु क्षीर सागर में चार माह (चतुर्मास) की गहन योगनिद्रा के पश्चात जागे। इससे विगत चतुर्मास में कोई मांगलिक कार्य नहीं करने का विधान है। इस एकादशी को देव उठनी एकादशी या प्रबोधिनी एकादशी भी कहते हैं। भगवान विष्णु के भक्तों का महापर्व है यह दिन। इस एकादशी के पश्चात विवाह तथा सभी मांगलिक कार्यों का मार्ग खुल जाता है।
विष्णु भगवान सौम्य, धैर्य, विचारशीलता और सद्बुद्धि के लिए जाने जाते हैं। यह दिन उनकी आराधना, पूजा अर्चना का, और उनके जीवन मूल्यों से शिक्षा लेने का है। यह पर्व अंतर्ज्ञान, आध्यात्मिक समृद्धि, उद्बोधन है। इस दिन उपवास की भी परंपरा है।
संसार के संचालन के भारी दायित्व निभाते-निभाते भगवान विष्णु के लिए सुदीर्घ विश्रााम आवश्यक था। देव उठनी एकादशी में एक संदेश यह है कि सतत मानसिक, आध्यात्मिक और शारीरिक कार्य और व्यस्तता के बाद पुनः नई ऊर्जा के साथ तत्पर रहना है। देव उठनी एकादशी की वेला में खगोलीय स्थितियों के कारण नई स्फूर्ति के आसार बनते हैं।
ग्यारह की संख्या: 11 एक विशेष अंक है, गणित में इसे मास्टर संख्या कहते हैं। हिंदू संस्कृति में इसे बहुत शुभ मानते हैं। सिद्धांत ज्योतिष (या अंकज्योतिष) में 11 के एक और एक यानी दो चंद्रमा का स्वामी है।
त्रिदेवों में भगवान विष्णु समूची सृष्टि के पालनकर्ता और संरक्षक हैं। चतुर्मास में भगवान विष्णु की निष्क्रियता के कारण सांसारिक कार्य ठप्प न हों, इस आशय से उनके कार्य अन्य देवता निभाते हैंः श्रावण के दिनों भमवान शिव, जन्माष्टमी में भगवान कृष्ण, और नवरात्रि में मां दुर्गा।
प्रकृति के विराट स्वरूप के समक्ष मनुष्य की औकात नहीं है। उसका अस्तित्व एक बूंद के समान है किंतु अहंकार इतना जैसे वह महासमुद्र हो। विशेषकर उष्णकटिबंधीय (ट्रॉपिकल) अंचलों में सौर्य किरणों की तीव्रता में मामूली फेर से भीषण ठंड या फिर गर्मी का हाहाकार मच जाता है; कभी आबोहवा बदले तो बारिश का कहर बरप जाता है। दैविक मानी जाती ये अस्मिताएं सर्वत्र जनजीवन का अभिन्न अंग रही हैं। विष्णु की पूजा-अर्चनाओं में स्वास्थ्य, समृद्धि और खुशहाली के लिए इनका आह्वान किया जाता है।
साक्ष्य न मिलने पर खगोलीय अस्मिताएं की दिशा और गति के मनुष्य पर पड़ते प्रभाव को खारिज कर देना परिपक्व सोच नहीं दर्शाता। खगोलीय पिंडों के अनुरूप निर्मित भवनों में आध्यात्मिक भाव उत्पन्न होने और वहां उच्च शक्तियों से संवाद बनने के उल्लेख सदियों से दर्ज हैं। चंद्रमा का प्रभाव ज्वार भाटों में स्पष्ट परिलक्षित हो सकता है तो मनुष्य की अंदुरुनी संरचना और मनोदशा पर क्यों नहीं होगा? वैज्ञानिक अध्ययनों ने अनेक मामलों में पूर्णिमा के दिन नींद उचटने की पुष्टि की है।
उच्च, सार्वभौम शक्ति की एक सूक्ष्म इकाई होने के कारण कोई भी व्यक्ति ब्रह्मांड के पिंडों की संचालन व्यवस्था से अछूता नहीं रह सकता। संपूर्ण जगत के पालनकर्ता भगवान विष्णु को श्रद्धापूर्वक नमन!
